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टाइपराइटर मशीनें बन गईं इतिहास

अब आपको कोर्ट कचहरी और सरकारी दफ्तरों के बाहर बैठे टाइपिस्ट नहीं दिखाई देंगे क्योंकि जल्द ही टाइपराइटर इतिहास में दर्ज हो जाएगा। महाराष्ट्र सरकार ने सरकारी नौकरी के लिए टाइपराइटर टेस्ट की जरूरत खत्म कर दी है, जिससे कई टाइपिस्ट अब भूखे मरने की कगार पर आ जाएंगे। हालांकि इस डिजिटल युग में वैसे भी टाइपिस्ट की कहीं जरुरत नहीं रह गई थी, जो बचे थे वे कोर्ट कचहरी और सरकारी दफ्तरों के बाहर अपनी दूकान चला रहे थे।

जैसा की सभी जानते हैं मोदी सरकार डिजिटाइजेशन को बढ़ावा दे रही है। इस डिजिटाइजेशन को बढ़ावा देने में टाइपराइटर मशीनों की उपयोगिता समाप्त हो गयी है।

ऐसे ही एक टाइपिस्ट हैं विनोद भूषण, जो सीएसटी स्टेशन के बाहर टाइपराइटर का काम करते हैं।ऐफिडेविट और कानूनी दस्तावेजों को टाइप करके ही भूषण अपनी जीविका चलाते हैं। लेकिन जब से डिजिटाइजेशन को बढ़ावा देने की चली तब से इनकी जीविका की गाड़ी पर ब्रेक लग गया। पहले इनके पास इतना काम आता था कि टाइप करते करते इनके हाथ ही नहीं रुकते थे, लेकिन अब मात्र वहीँ लोग आते हैं जिन्हें कुछ सरकारी काम या कोर्ट कचहरी के काम ही होते हैं।

भूषण कहते हैं कि नई तकनीक और कंप्यूटर के जमाने में टाइपराइटिंग मशीनों का कोई मतलब नहीं है। इसीलिए अब वे कुछ दुसरे जॉब की तलाश में हैं, लेकिन इस उम्र में क्या करूं समझ में नहीं आता।

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